Saturday, July 12, 2008

हिन्दी..एक प्रयास

यूरोप में काफ़ी समय बिताने पर एक बात का मुझे विशवास हो गया है के यहाँ के लोग अपनी मात्रु भाषा को काफ़ी महत्त्व देते हैं। यहाँ हर चीज़ उनकी भाषा में होती है चाहे वोह सड़क पर लगे बोर्ड हो या फ़िर उनके अखबार, अंग्रेज़ी न तो देखने मिलती हैं न सुनने। यह लोग बिना अंग्रेज़ी जाने अपना पूरा जीवन बड़े आराम से व्यतीत कर सकते हैं, इतना ही नही वह अभियांत्रिकी, विज्ञान व चित्कित्सा शात्स्त्र के शेत्रो में अनुसंधान अपनी भाषा में सफलता पूर्वक करते आए है । जर्मनी, रूस, ग्रीस, फ्रांस ऐसे उधंरण हैं जहाँ राष्ट्रीय भाषा का महत्त्व जीवन के हर पहलु में दिखाई देता है। इनका साहित्य, संगीत, सिनेमा सब कुछ उनकी भाषा में इतना लोकप्रिय अवं विकसित है के उन्हें किसी और भाषा को जाने की आवश्यकता नही पड़ती।

भारत में हम कितने हिन्दी, बंगाली, कन्नड़ इतियादी समकालीन साहित्यकारों के नाम जानते हैं । शायद बहुत कम। और कितने समकालीन अंग्रेज़ी साहित्यकारों को हम जानते हैं...उस सूची के लिए ऐसे १० ब्लॉग पोस्ट भी कम पड़ेंगे।
इस बात से किसी को इनकार नही के भारत में बीपीओ अवं आई टी शेत्रो की सफलता में अंग्रेज़ी भाषा का बहुत बड़ा हाथ है, पर इसका यह मतलब भी नही के हम अपनी भाषाओँ को महत्व न दे। हमे अंग्रेज़ी में आपस में बात करता देख हमारे उरोपीय क्लायन्ट मुझे कई बार यह सवाल पूछ चुके हैं के हम अपनी भाषा में क्यों बात नही करते।

यह मेरा हिन्दी ब्लॉग पोस्ट लिखने का पहला प्रयास था, में देखना चाहता था के क्या आज भी मै अपनी सोचने की भाषा में कुछ लिख सकता हूँ या नही। हम अंग्रेज़ी भाषा को ब्लॉग्गिंग की स्वाभाविक भाषा क्यूँ मान लेते हैं, आम तौर पर कोई भी अपने सोचने की भाषा में लिखता है क्यूँ के वह अपने आप को उस भाषा में बेहतर अभिव्यक्त कर सकता है। पर शायद में अंग्रेज़ी में ब्लॉग करते हुए अधिक सरलता के साथ अपने विचार अभिव्यक्त कर सकता हूँ..यह एक वास्तविकता है जिसका मुझे खेद है..पर शायद भविष्य में यह बदल जाए इसी उम्मीद के साथ। अगला ब्लॉग अंग्रेज़ी में :)